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गुरुदेव ही मनुष्य केमन मस्तिष्क में ज्ञान का सृजन कर सकते हैं महामंडलेश्वर कपिल मुनि महाराज हरिद्वार

विजय कुमार बंसल हरिद्वार ब्यूरो

  1. गुरुदेव ही मनुष्य केमन मस्तिष्क में ज्ञान का सृजन कर सकते हैं महामंडलेश्व20260422 183955 COLLAGEर कपिल मुनि महाराज हरिद्वार

कनखल स्थित प्रसिद्ध श्री हरे राम आश्रम में आज का दिन आध्यात्मिक चेतना, भक्ति और गुरु कृपा की दिव्य अनुभूति से ओतप्रोत रहा, जहाँ प्रातः स्मरणीय परम तपस्वी एवं विद्वान महामंडलेश्वर श्री कपिल मुनि जी महाराज ने संत महापुरुषों एवं श्रद्धालु भक्तों की विशाल सभा के मध्य अपने श्रीमुख से ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की अमृत वर्षा करते हुए कहा कि मनुष्य का मन चंचल और मस्तिष्क सीमित होता है, परंतु गुरुदेव की कृपा से वही मन स्थिर और मस्तिष्क ज्ञानमय बन जाता है, गुरु ही वह दिव्य शक्ति हैं जो अज्ञान रूपी अंधकार को नष्ट कर आत्मा में प्रकाश का संचार करते हैं, उन्होंने आगे कहा कि बिना गुरु के न तो आत्मज्ञान संभव है और न ही ईश्वर की सच्ची अनुभूति, गुरु ही वह सेतु हैं जो जीव को भगवान से जोड़ते हैं और जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं।इस पावन अवसर पर महंत कृष्णा मुनि जी महाराज ने गुरु महिमा का अत्यंत मार्मिक वर्णन करते हुए कहा कि गुरु केवल उपदेश देने वाले नहीं होते बल्कि वे जीवन को संवारने वाले शिल्पकार होते हैं, जो अपने आशीर्वाद से शिष्य के भीतर छिपी दिव्यता को प्रकट करते हैं, उन्होंने कहा कि श्रद्धा, सेवा और समर्पण ही वह मार्ग है जिससे शिष्य गुरु कृपा का अधिकारी बनता है, और जिस पर गुरु की कृपा हो जाती है उसके जीवन में कभी अंधकार नहीं रहता, ईश्वर स्वयं उसकी रक्षा करते हैं और उसे सन्मार्ग पर अग्रसर करते हैं।

वहीं श्री पंजाबी बाबा जी महाराज ने धर्म, कर्म और ईश्वर में अटूट आस्था का महत्व बताते हुए कहा कि वर्तमान युग में मनुष्य भौतिक सुखों में उलझकर अपने वास्तविक उद्देश्य को भूलता जा रहा है, उन्होंने भक्तों को प्रेरित करते हुए कहा कि सच्चा सुख केवल भगवान की भक्ति और सत्कर्मों में ही निहित है, जो व्यक्ति अपने जीवन में धर्म का पालन करता है, सच्चाई और करुणा को अपनाता है तथा निरंतर ईश्वर का स्मरण करता है, वही जीवन के वास्तविक आनंद और शांति को प्राप्त करता है।

साथ ही कोतवाल कमल मुनि महाराज ने गुरु की अनंत महिमा का भावपूर्ण वर्णन करते हुए कहा कि गुरु का स्थान इस सृष्टि में सर्वोच्च है, क्योंकि वे ही शिष्य को जन्म-मरण के बंधनों से मुक्त कराने का मार्ग बताते हैं, उन्होंने कहा कि गुरु का सान्निध्य और उनकी वाणी ही वह दिव्य अमृत है जो आत्मा को तृप्त करता है और जीवन को सफल बनाता है, गुरु के चरणों में सच्चे मन से समर्पण करने वाला व्यक्ति कभी दुखी नहीं रहता और उसे जीवन के हर मोड़ पर मार्गदर्शन प्राप्त होता है।

इस दिव्य संत समागम में सभी संत महापुरुषों के श्रीमुख से निकले पावन वचनों की वर्षा से समस्त वातावरण भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा से गुंजायमान हो उठा, उपस्थित भक्तजन भाव-विभोर होकर गुरु महिमा का गुणगान करते रहे और अपने जीवन को धर्म, भक्ति एवं सत्कर्मों के मार्ग पर चलाने का संकल्प लिया, इस प्रकार यह पावन आयोजन न केवल आध्यात्मिक ज्ञान का स्रोत बना बल्कि सभी के हृदय में गुरु और ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास और प्रेम को और भी दृढ़ कर गया।

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